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मानसकन्या
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मूल कवि – डॉ॰ हनुमंत चंद्रकांत चोपडेकर
अनुवाद – आदित्य दयानंद सिनाय भांगी
“मानसकन्या” – एक चीट मोगाळ आईक (कोंकणी कविता संग्रह)
तुम पर अतिचार हुए
उस काले दिन की
ख़ौफ़नाक क्षण की याद
आते ही
मेरी रूह
दहल उठती है
और पसीना छूटता है
क्रोध से दहकते
मेरे कंपित जीव की देह से
किस किस तरह से
तुमने बरदाश्त किए
उन
महायातनाओं के
निरंतर
कुत्सित अत्याचारों को?
राजधानी में घटे
उस
वारदात के दिन से
मुझे हर पल
एक प्रश्न सालता है
परस्त्री को माँ मानने
वाले
हमारे महापुरुष
इस आर्यावर्त में
जन्मे थे
यदि ऐसा कहा,
तो कौन विश्वास करेगा?
वैसे भी अब
मुझे
इस जगत् के प्रति
अविश्वास हो गया है
वह
विश्वास ही विक्षिप्त
हो गया है
नपुंसक हो गया है
अपने सब
रिश्तेदारों और
सगे-संबंधियों के साथ
तुम पर अत्याचार करने
वाले
हाथ
मेरे जैसे ही
पुरुष के थे
यह सत्य विदित होते ही
मैं ख़ुद
स्वयं को नरकगामी
मानता हूँ
छह नरकासुरों की
अँतड़ियाँ बाहर निकालकर
टाँग दिया चौराहे पर
मैं बाहर निकलता हूँ
निकालने
पुरुषत्व का
जनाज़ा
मुझे पता है
यहाँ
इनसान व्याधियों से
मरते हैं
तो कुछ रास्ते पर ही
ख़त्म हो जाते हैं
गाड़ी के नीचे आए
क्षण भर में रोटी की
तरह
बेले जाते हैं
ये जीव सिर्फ़ एक बार
में मरते हैं
एक बार में ही ख़त्म होते हैं
पर तुमने,
इतनी छोटी उम्र में
एकाएक
सहस्र मृत्यु
कैसे सहन किए...
हाँ कैसे????
अब तक
नहीं हुई उतनी
क्रांति
जाग्रत हुई है
एक ही वार में किया
उसने
विनाश कानून का
सुरक्षा का
प्रशासन का
राजनीति का
तथा अन्याय का भी
पर,
मेरे देश की बेटी!
मृत्यु से जूझकर
चिर निद्रा में सो गई
पर हम सबको
सतर्क कर गई तू