'भाषा का चेहरा - हिंदी की वर्तनी' यह आदित्य दयानंद सिनाय भांगी द्वारा लिखित ब्लॉग है। Who am I? 1) देवनागरी Typing Expert 2) Linguist, expert on Hindi Grammar 3) Proofreader, Compere (Hindi) 4) Translator (Konkani-Hindi) 5) I take workshops on हिंदी की वर्तनी in Goa. M.A. in Hindi, Cleared NTA UGC NET December 2019 with 65%. Contact me on - 1) https://www.facebook.com/aditya.sinaibhangui 2) https://twitter.com/Bhangui
Saturday, June 30, 2012
Tuesday, June 15, 2010
हरिशंकर परसाई का व्यंग्य और उनकी भाषा - आदित्य दयानंद सिनाय भांगी
हरिशंकर परसाई का व्यंग्य और
उनकी भाषा
- आदित्य दयानंद सिनाय भांगी
आधुनिक काल में साहित्य की विविध विधाओं
का प्रादुर्भाव हुआ और उनके उत्तरोत्तर विकास की नींव रखी गई और इसी मज़बूत नींव पर गद्य की विधाएँ पल्लवित-पुष्पित हुईं। इन्हीं विधाओं में व्यंग्य भी एक है। व्यंग्य विधा ने साहित्य में एक हलचल-सी मचा दी।
हास्य और व्यंग्य की प्रकृति बिलकुल अलग-अलग है। दोनों का प्रभाव क्षेत्र अलग है। हास्य
का कार्य जहाँ पाठक का मनोरंजन करना है, उसे हँसाना होता है, वहीं व्यंग्य का कार्य प्रहार करना है। हास्य रचना की समाप्ति पर पाठक
खिलखिलाता है, वहीं व्यंग्य की समाप्ति पर पाठक अव्यवस्था के
विरुद्ध खीझ और आक्रोश से भर उठता है। व्यंग्य का व्युत्पत्ति की दृष्टि से आशय
है – “शब्द का वह निगूढ़ अर्थ, जो व्यंजना वृत्ति के द्वारा सांकेतिक या
प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त हो।”
हरिशंकर परसाई जी
ने सामयिक समस्याओं को ही अपने लेखन का आधार बनाया है, जिसका मूल प्रयोजन समाज, राजनीति, प्रशासन आदि व्यवस्था को और बेहतर बनाना
है। परसाई जी ने आम और दैनिक जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी घटनाओं का भी बड़े अनोखे ढंग
से वर्णन किया है। जैसे – राशन की समस्या, कार्यालयों में
व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या, पुलिस प्रशासन में व्याप्त
विसंगतियाँ, सफ़ेद बाल की समस्या आदि। इस सबका वर्णन उन्होंने
चुटीली एवं मारक भाषा में किया है। भाषा के बिना मनुष्य मृतक के समान है। भाषा
मनुष्य के जीवन में नितांत आवश्यक है। जब साहित्य मनुष्य
जीवन में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों, विविध समस्याओं, परिवेशगत विडंबनाओं एवं विषमताओं का
परदाफ़ाश करता है, तो बेशक उसकी भाषा चमत्कारिक, रमणीय, प्रसाद गुण मिश्रित न होकर मारक, कटु, आलोचनात्मक, ग्राम्य व्यंग्यात्मक
बन जाती है। वस्तुतः यही व्यंग्य की भाषा और उसका प्रमुख हथियार है। वह सीधे शब्दों
में अपनी बात कह जाती है और पाठक को अचंभित कर डालती है। सामान्य भाषा अभिधात्मक
होती है। व्यंग्य भाषा सामान्य भाषा से विशिष्ट शब्दों को चुनकर उन्हें अपनी
प्रकृति के अनुकूल ढाल लेती है। व्यंग्य भाषा तो मुहावरे और लोकोक्ति के स्वरूप
में भी उलटफेर करके नए अर्थ देने की कोशिश करती है। परसाई जी का कहना है – “एक-एक
चौपाई के जब वे कई अर्थ निकालते हैं, तो मेरे मन में आता है
कि इनसे कहूँ भाई, जिसकी बात के एक से अधिक अर्थ निकले, वह संत नहीं लुच्चा आदमी होता है। संत की बात सीधी और स्पष्ट होती है और
उसका एक ही अर्थ निकलता है।”1
व्यंग्य भाषा के
अपने तेवर होते हैं, अपने अंदाज़
होते हैं। व्यंग्य की भाषा शास्त्र की भाषा नहीं होती। डॉ॰ श्यामसुंदर घोष लिखते
हैं, “व्यंग्य लेखक की भाषा में धार और नोक दोनों ज़रूरी हैं।
कभी नश्तर लगाता है, तो कभी खंजर चुभोता है।”2
परसाई जी की सीधी-सरल भाषा ने ही व्यंग्य के स्तर को ऊँचा बनाया है। पाठक उनकी
रचना पढ़कर उसमें छिपे गूढ़ उद्देश्य को सहज रूप से ग्रहण कर लेता है। वे बोझिल, क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से पांडित्य प्रदर्शन करना नहीं चाहते। उनकी सीधी-सादी
एवं मोहक भाषा के विषय में कृष्णकुमार सिन्हा लिखते हैं,
“सीधी-सादी भाषा में वक्रता उत्पन्न करना असाधारण साधना की अपेक्षा रखती है और इस
दिशा में परसाई अद्वितीय हैं। उनका हर शब्द व्यंग्य का पुट लिये रहता है।”3
परसाई की भाषा नुकीली-फुरतीली और चीर फाड़ करने वाली है। सरकारी अफ़सर हो या कोई
राजनीतिज्ञ, शहरी परिवेश हो या ग्रामीण, ऐतिहासिक चरित्र हो या पौराणिक, इन सारे चरित्रों
के ज़रिये परसाई जी ने समाज के हर क्षेत्र में व्याप्त मिथ्याचार, पाखंड और अन्याय से लड़ने के अस्त्र के रूप में भाषा को अपनाया है। परसाई जी
ने अपनी भाषा में हिंदी भाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग भी किया
है। भाषा को मज़बूत बनाने के लिए मुहावरों, सूक्तियों और
कहावतों का भी प्रयोग किया है।
परसाई के शब्द और स्रोत :
प्रत्येक
साहित्य की विशिष्ट शब्द संपदा होती है। अतः उसके अपने शब्द-समूह के अतिरिक्त
संपर्क में आने वाली अन्य भाषाओं से भी शब्दों का उपयोग साहित्य में हो जाता है। परसाई
जी ने अपनी ज़रूरत और प्रसंगानुसार अन्य भाषाओं के शब्द जैसे अरबी, फ़ारसी, उर्दू, अँग्रेज़ी तथा संस्कृत एवं ग्राम्य बोलियों के विशिष्ट शब्दों का प्रयोग
किया है।
अरबी शब्दों में
ख़राब, मुल्क, हौसला,
तारीफ़, फ़र्क़, इनसान,
सवाल आदि शब्दों का प्रयोग किया है, तो फ़ारसी
शब्दों में बदतमीज़ी, बाज़ार, बीमार,
बाइज़्ज़त आदि शब्द आए हैं।
अँग्रेज़ी शब्दों
का प्रयोग पांडित्य प्रदर्शन के उद्देश्य से नहीं, बल्कि व्यंग्य में सौंदर्य लाने एवं उसे अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए
किया है। अँग्रेज़ी शब्द भी ऐसे हैं जो हिंदी के दैनिक प्रयोग में स्वीकृत हो चुके
हैं। जैसे – डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, कॉलेज, स्पीच, फ़ाइल, फ़ोटो, न्यूज़पेपर, कमीशन, नंबर,
पास, फ़ेल, पार्टी,
लीडर, ऑफ़िसर, फ़ैशन आदि। कई
अँग्रेज़ी शब्दों का हिंदीकरण भी किया है। उन शब्दों में हिंदी व्याकरण के
नियमानुसार वचन-लिंग में परिवर्तन किया है। जैसे – वोटरों,
मैनेजरी, रिपोर्टों, मीटिंगों, लीडरों आदि।
शैली में परसाई
जी ने आत्मकथात्मक शैली, वर्णनात्मक
शैली, विश्लेषणात्मक शैली, पत्रात्मक
शैली, डायरी शैली आदि का प्रयोग किया है। “चूहा और मैं” और “दो नाक वाले लोग” आत्मकथात्मक शैली में लिखे गए हैं। उनकी
रचनाओं में प्रतीक मानव स्वभाव के परिचायक बनकर आए हैं। जैसे - कुरसी – प्रतिष्ठा, पद। गधा – मूर्खता, बकरी – जनता, पेपरवेट – वज़न, रिश्वत आदि। अलंकारों में मानवीकरण, उत्प्रेक्षा, उपमा, रूपक, अपकर्ष आदि का बख़ूबी से प्रयोग किया है।
मुहावरे
अभिधार्थ से भिन्न कोई विशेष अर्थ ध्वनित करते हैं। उनकी उत्पत्ति प्रायः भावावेग
के कारण होती है। परसाई जी ने मुहावरों का प्रयोग बड़ी कुशलता के साथ किया है। जैसे
– पोल खोलना, धोबी पछाड़ देना, रंगे हाथों पकड़े जाना आदि।
व्यंग्यात्मक
सूक्तियाँ जैसे – “बेईमानी के
पैसे में ही पौष्टिक तत्त्व बचे हैं”, “आदमी मर्द नहीं होता, पैसा मर्द होता है”, “झूठ बोलने के लिए सबसे
सुरक्षित जगह अदालत है” आदि का प्रयोग किया है। मुहावरों की तरह लोकोक्तियाँ तथा
व्यंग्यात्मक सूक्तियाँ व्यंग्य भाषा का महत्त्वपूर्ण औज़ार है। मुहावरे और
लोकोक्ति में अंतर यह है कि मुहावरे अपने आप में स्वतंत्र नहीं आते, बल्कि वाक्य में घुल-मिलकर आते हैं। लोकोक्ति स्वतंत्र रूप में आती है। लोकोक्तियाँ
जैसे “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय”, “डबरे के मेंढक”
आदि का प्रयोग हुआ है।
कुल-मिलाकर यह
कहा जा सकता है कि परसाई की व्यंग्य कला अपने आप में विलक्षण और अद्भुत है।
उन्होंने व्यंग्य को सिर्फ़ हास्य और मनोरंजन कराने वाली कला की सीमा से निकालकर, गंभीर, व्यंजनापूर्ण, साहित्य में उपेक्षित रहने वाले हिंदी व्यंग्य को तेजोमय व्यक्तित्व के
उच्चासन पर स्थापित किया है।
संदर्भ
–
1)
मेरी
श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, हरिशंकर
परसाई, पृ॰ 83
2)
व्यंग्य
क्या व्यंग्य क्यों? डॉ॰
श्यामसुंदर घोष, पृ॰ 119
3)
हिंदी के
प्रमुख व्यंग्यकार, कृष्णकुमार
सिन्हा, पृ॰ 85
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