'भाषा का चेहरा - हिंदी की वर्तनी' यह आदित्य दयानंद सिनाय भांगी द्वारा लिखित ब्लॉग है। Who am I? 1) देवनागरी Typing Expert 2) Linguist, expert on Hindi Grammar 3) Proofreader, Compere (Hindi) 4) Translator (Konkani-Hindi) 5) I take workshops on हिंदी की वर्तनी in Goa. M.A. in Hindi, Cleared NTA UGC NET December 2019 with 65%. Contact me on - 1) https://www.facebook.com/aditya.sinaibhangui 2) https://twitter.com/Bhangui
Thursday, October 16, 2014
Thursday, February 28, 2013
मेरे विचार
1) Many people hate me
only because I don’t support their every stupid, nonsense plans &
programmes. If I start supporting them & going everywhere with them &
praise them, they will start giving me respect more than anyone.
2) Nobody can hurt me without my permission. - Mahatma Gandhi.
3) मेरे
दुश्मनो, एक बात कान खोलकर सुनना, हमारी दोस्ती अंबुजा सीमेंट से भी मज़बूत है।
छोटी-मोटी गलतफ़हमियों से नहीं टूटने वाली। स्वरचित कहानियाँ गढ़कर दोस्ती में दरार
डालने की कोशिश भी मत करना। एक तो कोशिश नाकाम होगी और दूसरा तुम्हारी 206
हड्डियों के मुझे 412 टुकड़े करना भी आता है यह मत भूलना। 1) मेरे
दुश्मनो, एक बात कान खोलकर सुनना, हमारी दोस्ती अंबुजा सीमेंट से भी मज़बूत है।
छोटी-मोटी गलतफ़हमियों से नहीं टूटने वाली। स्वरचित कहानियाँ गढ़कर दोस्ती में दरार
डालने की कोशिश भी मत करना। एक तो कोशिश नाकाम होगी और दूसरा तुम्हारी 206
हड्डियों के मुझे 412 टुकड़े करना भी आता है यह मत भूलना।
4) मेरी
उपलब्धियों से तुम्हें अगर ख़ुशी होती है, उसे मैं कभी भी कम होने नहीं दूँगा।
5) Don’t be a blind
follower of anyone. At least you must have your own opinions.
6) Many people get awards easily only because they know the right bread, on which they apply butter.
1 7) Dear enemies, just
think or do something bad to me. No, I will not take any revenge. But, god
will. Every time this has turned true.
8) मुझसे नफ़रत तभी करना जब मेरे बारे में सब कुछ जानते हो, तब नहीं जब किसी से कुछ सुना हो।
9) किसी तरह भी मर्यादा में जो तुमसे बड़े हैं, वे
तुम्हारे साथ समानता का व्यवहार करते हैं, तो उसे उनकी कृपा
समझो, अपना अधिकार नहीं! – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर
10) Some people do wrong things confidently. Then why to hesitate in doing right things fearlessly?
11) Life becomes easier
when you delete negative people from it.
12) If you are sad or if you are happy, remember only one thing – यह दिन भी गुज़रेंगे!
12) If you are sad or if you are happy, remember only one thing – यह दिन भी गुज़रेंगे!
13) किसी इनसान की
ख़ूबियों पर तो सब ख़मोश रहते हैं। चर्चा अगर उसकी बुराई पर हो, तो
गूँगे भी बोल पड़ते हैं!
14) I know very well
who are with me & which group of people is against me. Who are involved in
planned comments on my statuses by making a group against me. Don’t try to be smart
with me.
15) कुछ लोग सिर्फ़
दूसरों को बदनाम करके ख़ुद फ़ेमस होना चाहते हैं।
16) लोग हमारे बारे में
क्या सोचेंगे यह भी अगर हम ही सोचने लगेंगे तो लोग क्या सोचेंगे?
17) मेरे सफलता के मार्ग
में बाधक बनने वालों को मैं उखाड़कर फेंकने में कोई देर नहीं करता।
18) अच्छा काम करते समय
डरने की क्या ज़रूरत? यहाँ आतंकवादी बुरा काम करने से नहीं डरते।
चोर, ख़ूनी, आरोपी तो आराम से सरेआम बेफ़िक्र
होकर घूमते हैं, तो हम जीवन में क्यों डरें?
19) Don’t stress yourself with useless
people who don’t even deserve to be an issue in your life.
20) People will notice the change in your
attitude towards them. But won’t notice their behaviour that made you change.
21) यदि सच तुम्हारे साथ
है, तो
कोई और तुम्हारे साथ है या नहीं, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
22) Don’t change so people will like you. Be
yourself and the right people will love the real you.
23) थोडे साहित्यकार वा हेर वेवसायीक मनीस, जे आपल्याक व्हडले समजतात, ते साहित्यीक क्षेत्रांत पावतकच केन्नाच धर्माक तेंको दिनात. कारण, एक म्हणजे धर्माक तेंको दिवप म्हणजे तांकां न्यूनगंडात्मक
(Inferiority Complex) दिसता. दुसरें
म्हळ्यार साहित्यीक आसून
धार्मीक भेदभावाचो आरोप येवपाचो भंय आसता. आनी तिसरें कारण म्हणजे तांचे मुखेल लक्ष्य फकत साहित्यीक
क्षेत्रूच आसता, धार्मीक वाद वा हेर
समान गजालींचेर चड लक्ष
दिलें जाल्यार तांकां साहित्यीक क्षेत्रांत सुणो लेगीत पळोवचो ना. म्हणजेच, तांचो पयलो स्वार्थ आपणें सगळ्यांमदीं श्रेष्ठ जावप, समाज गेलो तेल लायत...!!! (This is in Konkani)
24) Sometimes those who don’t socialize much aren’t
actually anti-social, they just have no tolerance for drama & fake people.
25) Never beg someone to be in your life. If you text, call, visit and still
get ignored, then walk away. It’s called ‘Self Respect’.
26) कोई भी नकारात्मक आंदोलन लंबे समय तक अपना प्रभाव नहीं रख पाता।
27) Don’t unfriend or block your enemies. Keep them in your friend list.
Let them be jealous of your success.
28) Some extra scholars, so
called educated are against political party
which is very good. What does this show? ज्ञानी होने से कुछ नहीं होता, विवेक होना चाहिए।
29) अगर किसी मनुष्य का असली स्वभाव जानना है, तो उसकी गाड़ी को ठोकर मारकर देखो!
30) कोई भी आदमी अच्छा या बुरा नहीं होता और हर एक आदमी के लिए
दूसरा आदमी अच्छा या बुरा होता है। हर व्यक्ति से दूसरे के संबंध पर वह यह निर्भर
करता है कि कौन किसके लिए कैसा है? जैसे- मैं मेरे दोस्तों के लिए अच्छा कहलाऊँगा,
वहीं मेरे दुश्मनों के लिए मैं बुरा हूँ।
Sunday, January 20, 2013
हिंदी या अँग्रेज़ी?
इंग्लिश
बोलना कोई बड़ी बात नहीं है। अमरीका में झाड़ूवाला भी इंग्लिश बोलता है, क्योंकि वह उसकी मातृभाषा है।
विदेश में
होना कोई बड़ी बात नहीं है। अमरीका में जन्मा कुत्ता भी वहीं पर रहता है। भारत
विकसित देश होता तो विदेशी भी बड़े गर्व से कहते कि “मेरा बेटा भारत में है।”
Language is never a
tool to measure intelligence. But sadly in India, those who speak English are
considered as scholars & those who speak in their mother tongue are often
disrespected.
इनसान एक दुकान है और ज़ुबान उसका ताला। ताला खुलता है तब
मालूम होता है कि दुकान सोने की है या कोयले की।
मूर्खों से तर्क मत कीजिए क्योंकि पहले वह आपको अपने
स्तर पर लाएँगे और फिर अपने अनुभवों से आपकी फ़ज़ीहत कर देंगे।
Tuesday, June 15, 2010
हरिशंकर परसाई का व्यंग्य और उनकी भाषा - आदित्य दयानंद सिनाय भांगी
हरिशंकर परसाई का व्यंग्य और
उनकी भाषा
- आदित्य दयानंद सिनाय भांगी
आधुनिक काल में साहित्य की विविध विधाओं
का प्रादुर्भाव हुआ और उनके उत्तरोत्तर विकास की नींव रखी गई और इसी मज़बूत नींव पर गद्य की विधाएँ पल्लवित-पुष्पित हुईं। इन्हीं विधाओं में व्यंग्य भी एक है। व्यंग्य विधा ने साहित्य में एक हलचल-सी मचा दी।
हास्य और व्यंग्य की प्रकृति बिलकुल अलग-अलग है। दोनों का प्रभाव क्षेत्र अलग है। हास्य
का कार्य जहाँ पाठक का मनोरंजन करना है, उसे हँसाना होता है, वहीं व्यंग्य का कार्य प्रहार करना है। हास्य रचना की समाप्ति पर पाठक
खिलखिलाता है, वहीं व्यंग्य की समाप्ति पर पाठक अव्यवस्था के
विरुद्ध खीझ और आक्रोश से भर उठता है। व्यंग्य का व्युत्पत्ति की दृष्टि से आशय
है – “शब्द का वह निगूढ़ अर्थ, जो व्यंजना वृत्ति के द्वारा सांकेतिक या
प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त हो।”
हरिशंकर परसाई जी
ने सामयिक समस्याओं को ही अपने लेखन का आधार बनाया है, जिसका मूल प्रयोजन समाज, राजनीति, प्रशासन आदि व्यवस्था को और बेहतर बनाना
है। परसाई जी ने आम और दैनिक जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी घटनाओं का भी बड़े अनोखे ढंग
से वर्णन किया है। जैसे – राशन की समस्या, कार्यालयों में
व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या, पुलिस प्रशासन में व्याप्त
विसंगतियाँ, सफ़ेद बाल की समस्या आदि। इस सबका वर्णन उन्होंने
चुटीली एवं मारक भाषा में किया है। भाषा के बिना मनुष्य मृतक के समान है। भाषा
मनुष्य के जीवन में नितांत आवश्यक है। जब साहित्य मनुष्य
जीवन में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों, विविध समस्याओं, परिवेशगत विडंबनाओं एवं विषमताओं का
परदाफ़ाश करता है, तो बेशक उसकी भाषा चमत्कारिक, रमणीय, प्रसाद गुण मिश्रित न होकर मारक, कटु, आलोचनात्मक, ग्राम्य व्यंग्यात्मक
बन जाती है। वस्तुतः यही व्यंग्य की भाषा और उसका प्रमुख हथियार है। वह सीधे शब्दों
में अपनी बात कह जाती है और पाठक को अचंभित कर डालती है। सामान्य भाषा अभिधात्मक
होती है। व्यंग्य भाषा सामान्य भाषा से विशिष्ट शब्दों को चुनकर उन्हें अपनी
प्रकृति के अनुकूल ढाल लेती है। व्यंग्य भाषा तो मुहावरे और लोकोक्ति के स्वरूप
में भी उलटफेर करके नए अर्थ देने की कोशिश करती है। परसाई जी का कहना है – “एक-एक
चौपाई के जब वे कई अर्थ निकालते हैं, तो मेरे मन में आता है
कि इनसे कहूँ भाई, जिसकी बात के एक से अधिक अर्थ निकले, वह संत नहीं लुच्चा आदमी होता है। संत की बात सीधी और स्पष्ट होती है और
उसका एक ही अर्थ निकलता है।”1
व्यंग्य भाषा के
अपने तेवर होते हैं, अपने अंदाज़
होते हैं। व्यंग्य की भाषा शास्त्र की भाषा नहीं होती। डॉ॰ श्यामसुंदर घोष लिखते
हैं, “व्यंग्य लेखक की भाषा में धार और नोक दोनों ज़रूरी हैं।
कभी नश्तर लगाता है, तो कभी खंजर चुभोता है।”2
परसाई जी की सीधी-सरल भाषा ने ही व्यंग्य के स्तर को ऊँचा बनाया है। पाठक उनकी
रचना पढ़कर उसमें छिपे गूढ़ उद्देश्य को सहज रूप से ग्रहण कर लेता है। वे बोझिल, क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से पांडित्य प्रदर्शन करना नहीं चाहते। उनकी सीधी-सादी
एवं मोहक भाषा के विषय में कृष्णकुमार सिन्हा लिखते हैं,
“सीधी-सादी भाषा में वक्रता उत्पन्न करना असाधारण साधना की अपेक्षा रखती है और इस
दिशा में परसाई अद्वितीय हैं। उनका हर शब्द व्यंग्य का पुट लिये रहता है।”3
परसाई की भाषा नुकीली-फुरतीली और चीर फाड़ करने वाली है। सरकारी अफ़सर हो या कोई
राजनीतिज्ञ, शहरी परिवेश हो या ग्रामीण, ऐतिहासिक चरित्र हो या पौराणिक, इन सारे चरित्रों
के ज़रिये परसाई जी ने समाज के हर क्षेत्र में व्याप्त मिथ्याचार, पाखंड और अन्याय से लड़ने के अस्त्र के रूप में भाषा को अपनाया है। परसाई जी
ने अपनी भाषा में हिंदी भाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग भी किया
है। भाषा को मज़बूत बनाने के लिए मुहावरों, सूक्तियों और
कहावतों का भी प्रयोग किया है।
परसाई के शब्द और स्रोत :
प्रत्येक
साहित्य की विशिष्ट शब्द संपदा होती है। अतः उसके अपने शब्द-समूह के अतिरिक्त
संपर्क में आने वाली अन्य भाषाओं से भी शब्दों का उपयोग साहित्य में हो जाता है। परसाई
जी ने अपनी ज़रूरत और प्रसंगानुसार अन्य भाषाओं के शब्द जैसे अरबी, फ़ारसी, उर्दू, अँग्रेज़ी तथा संस्कृत एवं ग्राम्य बोलियों के विशिष्ट शब्दों का प्रयोग
किया है।
अरबी शब्दों में
ख़राब, मुल्क, हौसला,
तारीफ़, फ़र्क़, इनसान,
सवाल आदि शब्दों का प्रयोग किया है, तो फ़ारसी
शब्दों में बदतमीज़ी, बाज़ार, बीमार,
बाइज़्ज़त आदि शब्द आए हैं।
अँग्रेज़ी शब्दों
का प्रयोग पांडित्य प्रदर्शन के उद्देश्य से नहीं, बल्कि व्यंग्य में सौंदर्य लाने एवं उसे अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए
किया है। अँग्रेज़ी शब्द भी ऐसे हैं जो हिंदी के दैनिक प्रयोग में स्वीकृत हो चुके
हैं। जैसे – डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, कॉलेज, स्पीच, फ़ाइल, फ़ोटो, न्यूज़पेपर, कमीशन, नंबर,
पास, फ़ेल, पार्टी,
लीडर, ऑफ़िसर, फ़ैशन आदि। कई
अँग्रेज़ी शब्दों का हिंदीकरण भी किया है। उन शब्दों में हिंदी व्याकरण के
नियमानुसार वचन-लिंग में परिवर्तन किया है। जैसे – वोटरों,
मैनेजरी, रिपोर्टों, मीटिंगों, लीडरों आदि।
शैली में परसाई
जी ने आत्मकथात्मक शैली, वर्णनात्मक
शैली, विश्लेषणात्मक शैली, पत्रात्मक
शैली, डायरी शैली आदि का प्रयोग किया है। “चूहा और मैं” और “दो नाक वाले लोग” आत्मकथात्मक शैली में लिखे गए हैं। उनकी
रचनाओं में प्रतीक मानव स्वभाव के परिचायक बनकर आए हैं। जैसे - कुरसी – प्रतिष्ठा, पद। गधा – मूर्खता, बकरी – जनता, पेपरवेट – वज़न, रिश्वत आदि। अलंकारों में मानवीकरण, उत्प्रेक्षा, उपमा, रूपक, अपकर्ष आदि का बख़ूबी से प्रयोग किया है।
मुहावरे
अभिधार्थ से भिन्न कोई विशेष अर्थ ध्वनित करते हैं। उनकी उत्पत्ति प्रायः भावावेग
के कारण होती है। परसाई जी ने मुहावरों का प्रयोग बड़ी कुशलता के साथ किया है। जैसे
– पोल खोलना, धोबी पछाड़ देना, रंगे हाथों पकड़े जाना आदि।
व्यंग्यात्मक
सूक्तियाँ जैसे – “बेईमानी के
पैसे में ही पौष्टिक तत्त्व बचे हैं”, “आदमी मर्द नहीं होता, पैसा मर्द होता है”, “झूठ बोलने के लिए सबसे
सुरक्षित जगह अदालत है” आदि का प्रयोग किया है। मुहावरों की तरह लोकोक्तियाँ तथा
व्यंग्यात्मक सूक्तियाँ व्यंग्य भाषा का महत्त्वपूर्ण औज़ार है। मुहावरे और
लोकोक्ति में अंतर यह है कि मुहावरे अपने आप में स्वतंत्र नहीं आते, बल्कि वाक्य में घुल-मिलकर आते हैं। लोकोक्ति स्वतंत्र रूप में आती है। लोकोक्तियाँ
जैसे “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय”, “डबरे के मेंढक”
आदि का प्रयोग हुआ है।
कुल-मिलाकर यह
कहा जा सकता है कि परसाई की व्यंग्य कला अपने आप में विलक्षण और अद्भुत है।
उन्होंने व्यंग्य को सिर्फ़ हास्य और मनोरंजन कराने वाली कला की सीमा से निकालकर, गंभीर, व्यंजनापूर्ण, साहित्य में उपेक्षित रहने वाले हिंदी व्यंग्य को तेजोमय व्यक्तित्व के
उच्चासन पर स्थापित किया है।
संदर्भ
–
1)
मेरी
श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, हरिशंकर
परसाई, पृ॰ 83
2)
व्यंग्य
क्या व्यंग्य क्यों? डॉ॰
श्यामसुंदर घोष, पृ॰ 119
3)
हिंदी के
प्रमुख व्यंग्यकार, कृष्णकुमार
सिन्हा, पृ॰ 85
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